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    ‘मेक इन इंडिया’ की बड़ी उड़ान! मिग-29K से दागा जाएगा स्वदेशी रॉकेट, दुश्मन के ठिकाने होंगे तबाह

    News Lead 18By News Lead 18June 5, 2026
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    नई दिल्ली: भारतीय नौसेना ने स्वदेशी रक्षा उत्पादन को बढ़ावा देने की दिशा में एक और बड़ा कदम उठाया है. नौसेना ने देश की रक्षा कंपनियों को 80 मिमी एयरो रॉकेट विकसित और बनाने के लिए आमंत्रित किया है. यह एक बिना गाइडेंस वाला हवा से जमीन पर मार करने वाला हथियार है, जिसे अभी विदेश से आयात किया जाता है. इस पहल का उद्देश्य युद्धक हथियारों के लिए विदेशी देशों पर निर्भरता कम करना है.

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    MiG-29K विमानों में होता है इस्तेमाल

    यह रॉकेट भारतीय नौसेना के मिग 29k लड़ाकू विमानों में इस्तेमाल किया जाता है. ये रूस में विकसित दो इंजन वाले लड़ाकू विमान हैं. इन्हें विमानवाहक पोत आईएनएस विक्रमादित्य पर तैनात किया गया है. आईएनएस विक्रमादित्य भारतीय नौसेना का एकमात्र सक्रिय विमानवाहक पोत है. MiG-29K उसके प्रमुख आक्रमणकारी लड़ाकू विमान माने जाते हैं.

    बख्तरबंद वाहनों को कर सकता है नष्ट

    यह रॉकेट B8M-1 पॉड लॉन्चर से दागा जाता है.रॉकेट का इस्तेमाल दुश्मन के बख्तरबंद वाहनों को निशाना बनाने के लिए किया जाता है. इसके अलावा यह रडार स्टेशनों, जमीन पर खड़े विमानों और सैनिक ठिकानों जैसे लक्ष्यों को भी नुकसान पहुंचा सकता है. विस्फोट के बाद इससे निकलने वाले धातु के टुकड़े आसपास के क्षेत्र में भारी तबाही मचा सकते हैं.

    क्या हैं इसकी खासियतें?

    नौसेना द्वारा जारी दस्तावेज के अनुसार पूरे रॉकेट का वजन लगभग 11.3 किलोग्राम होगा. इसकी लंबाई करीब 1.54 मीटर होगी. रॉकेट की अधिकतम गति 600 मीटर प्रति सेकंड तक हो सकती है. इसकी प्रभावी मारक क्षमता 1.3 किलोमीटर से 4 किलोमीटर तक रखी गई है. रॉकेट में 0.9 किलोग्राम का विस्फोटक वारहेड होगा. यह सीधे प्रहार की स्थिति में 400 मिमी मोटे कवच को भेदने में सक्षम होना चाहिए. विस्फोट के दौरान कम से कम 400 धातु के टुकड़े निकलने चाहिए. प्रत्येक टुकड़े का वजन लगभग 3 ग्राम होगा.

    कठिन परिस्थितियों में भी करना होगा काम

    नौसेना ने रॉकेट के लिए कड़े मानक तय किए हैं. इसे पूरी तरह सीलबंद बनाना होगा ताकि यह 20,000 मीटर तक की ऊंचाई पर सुरक्षित रहे. साथ ही यह 17,500 मीटर की ऊंचाई पर उड़ रहे विमान से भी इस्तेमाल किया जा सके. रॉकेट को माइनस 60 डिग्री सेल्सियस से लेकर प्लस 60 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान में काम करने योग्य होना चाहिए .  यह बेहद ठंडे पहाड़ी इलाकों से लेकर समुद्र के गर्म और नम वातावरण तक हर स्थिति में उपयोग किया जा सके.

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    प्रशिक्षण के लिए अलग संस्करण भी बनेगा

    नौसेना केवल युद्धक रॉकेट ही नहीं चाहती. पायलटों के प्रशिक्षण के लिए एक अभ्यास संस्करण भी विकसित किया जाएगा. इसकी उड़ान क्षमता असली रॉकेट जैसी होगी, लेकिन इसमें विस्फोटक वारहेड नहीं होगा. इससे प्रशिक्षण सुरक्षित और कम खर्चीला बनेगा.

    2026-27 तक शामिल करने की योजना

    नौसेना ने संकेत दिया है कि परीक्षण सफल रहने के बाद 273 वास्तविक रॉकेट खरीदे जा सकते हैं. इसके अलावा 2,400 अभ्यास राउंड भी लिए जाएंगे. यदि विकास और परीक्षण समय पर पूरे हो जाते हैं तो इस रॉकेट को 2026-27 के दौरान नौसेना में शामिल किया जा सकता है.

    आत्मनिर्भर भारत को मिलेगा बल

    यह कदम केंद्र सरकार की ‘आत्मनिर्भर भारत’ नीति के अनुरूप है. पिछले कुछ वर्षों में सेना, वायुसेना और नौसेना ने कई हथियारों, मिसाइलों और गोला-बारूद के स्वदेशीकरण पर जोर दिया है. नौसेना की यह नई परियोजना भी उसी प्रयास का हिस्सा है. इसका लक्ष्य है कि भविष्य में महत्वपूर्ण युद्धक हथियारों के लिए भारत को विदेशी आपूर्ति पर कम से कम निर्भर रहना पड़े.

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