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    Home » आम-काजू के बीच धान और मूंगफली की खेती की, मुनाफा 10 गुना ज्यादा‎
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    आम-काजू के बीच धान और मूंगफली की खेती की, मुनाफा 10 गुना ज्यादा‎

    News Lead18By News Lead18May 11, 2026
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    कोरबा जिले के करतला ब्लॉक में घिनारा गांव के किसान कन्हैया राठिया ने अपनी पथरीली और बंजर जमीन को सोना उगलने वाली जमीन बना दिया है। कन्हैया ने खेती का ऐसा मल्टी लेयर मॉडल अपनाया है, जिससे उनकी सालाना आमदनी 15 हजार रुपए से बढ़कर अब 2 लाख रुपये के पार पहुंच गई है।

    कन्हैया के पास महज 2 एकड़ जमीन है। कुछ साल पहले तक यहां सिंचाई की सुविधा नहीं थी। मिट्टी की गुणवत्ता भी बहुत खराब थी। कन्हैया बताते हैं कि पहले वे केवल बारिश के भरोसे रहते थे। उस समय थोड़ी-बहुत उड़द की फसल ले पाते थे, जिससे बमुश्किल घर का खर्च चलता था। सालभर में केवल 10 से 15 हजार रुपए की कमाई हो पाती थी। लेकिन कन्हैया कुछ नया करना चाहते थे और उन्होंने हार नहीं मानी।

    कन्हैया ने अपनी जमीन का इस्तेमाल वैज्ञानिक तरीके से करने का मन बनाया। इसके लिए सबसे पहले जमीन पर आम और काजू के पौधे लगाए। जब ये पेड़ बनने लगे तो उन्होंने मल्टी लेयर तकनीक अपनाते हुए पेड़ों के बीच खाली जमीन पर धान और मूंगफली की फसल लेना शुरू कर दिया। इससे एक ही जमीन पर एक साथ कई फसलें तैयार होने लगीं।

    इसे मल्टी लेयर मॉडल कहा जाता है। आम और काजू से उन्हें साल में एक बार बड़ी आय होती है, जबकि धान और मूंगफली से उन्हें नियमित रूप से पैसा मिलता रहता है। अब उनकी आय पहले के मुकाबले 10 गुना बढ़ चुकी है।

    कन्हैया की सफलता का सबसे बड़ा राज यह है कि वे बाजार से महंगी खाद या कीटनाशक नहीं खरीदते। इसके बजाय, वे अपने घर पर ही जीवामृत और प्राकृतिक खाद तैयार करते हैं। वे खेत में गिरने वाले पत्तों, गोमूत्र, गुड़ और बेसन के घोल से शक्तिशाली जैविक खाद बनाते हैं। नाबार्ड के जीवा कार्यक्रम से जुड़ने के बाद उन्होंने कीटनाशक दवा बनाना भी सीखा।

    कड़वे पत्तों और गोमूत्र से बनी यह दवा फसलों को बीमारियों से बचाती है। इससे उनकी खेती की लागत लगभग शून्य हो गई है और मिट्टी की उर्वरा शक्ति भी पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गई है।

    कन्हैया ने अपनी खेती को और मजबूत बनाने के लिए 50 डिसमिल जमीन पर एक छोटा तालाब खुदवाया है। इस तालाब में वे मछली पालन कर रहे हैं, जिससे उन्हें अलग से अच्छी कमाई होती है। तालाब होने की वजह से उनके खेतों को सालभर पानी मिलता है और इलाके का भूजल स्तर भी सुधरा है। तालाब की मेढ़ों पर उन्होंने दलहन और तिलहन की फसलें लगाई हैं। यानी उन्होंने जमीन के एक-एक इंच हिस्से का सही उपयोग किया है।

    कन्हैया का यह प्रयोग छोटे किसानों के लिए एक बहुत बड़ी सीख है। उन्होंने दिखाया है कि कम जमीन होने पर भी अगर किसान इंटीग्रेटेड फार्मिंग यानी एक साथ कई काम करें तो गरीबी को मात दी जा सकती है। कन्हैया अब अपने तीन बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलवा पा रहे हैं।

    उनका इको फॉर्म आज पूरे जिले के किसानों के लिए खेती का आदर्श पाठशाला बन गया है। कन्हैया का कहना है कि अगर हम प्रकृति की रक्षा करेंगे तो प्रकृति हमारी जरूरतों को दस गुना बढ़ाकर पूरा करेगी।

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