बिलासपुर : छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने विदेश से एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी कर बिलासपुर के छत्तीसगढ़ आयुर्विज्ञान संस्थान (सिम्स) में इंटर्नशिप करने वाले विदेशी मेडिकल ग्रेजुएट डॉक्टरों को राहत देने से इनकार कर दिया है। अदालत ने इंटर्नशिप के दौरान जमा कराई गई एक लाख रुपये की फीस वापस करने और अगस्त 2022 से पहले के स्टाइपेंड का भुगतान करने की मांग वाली तीन अलग-अलग याचिकाओं को खारिज कर दिया है।
जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की एकल पीठ ने सुनवाई के बाद स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ताओं ने अपनी विदेशी मेडिकल डिग्रियां 18 नवंबर 2021 से पहले प्राप्त की थीं। ऐसे में वे राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग (NMC) के वर्ष 2021 में लागू हुए नए नियमों के आधार पर पिछली अवधि के लिए लाभ पाने का दावा नहीं कर सकते।
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क्या है पूरा मामला?
इस मामले में मुख्य याचिका डॉ. श्यामू कुमार जांगड़े और 13 अन्य डॉक्टरों ने दायर की थी। इसके अलावा डॉ. छत्रेश चौधरी और डॉ. प्रणव पांडेय ने भी अलग-अलग याचिकाएं लगाई थीं। तीनों याचिकाओं में समान कानूनी और तथ्यात्मक मुद्दे होने के कारण हाईकोर्ट ने एक साथ सुनवाई की।
याचिकाकर्ताओं ने विदेश से एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी करने के बाद सिम्स बिलासपुर में अनिवार्य इंटर्नशिप की थी। उनका कहना था कि संस्थान ने इंटर्नशिप के लिए प्रत्येक डॉक्टर से एक लाख रुपये फीस जमा कराई थी। इसके साथ ही उन्हें भारतीय मेडिकल कॉलेजों के छात्रों के समान स्टाइपेंड और अन्य सुविधाएं भी नहीं दी गईं।
डॉक्टरों ने अपनी मांग के समर्थन में NMC के 4 मार्च 2022 के दिशा-निर्देश और 19 मई 2022 के परिपत्र का हवाला दिया था। उनका तर्क था कि इन निर्देशों के अनुसार 18 नवंबर 2021 से पहले विदेशी मेडिकल डिग्री हासिल करने वाले डॉक्टरों से इंटर्नशिप फीस नहीं ली जानी चाहिए। साथ ही उन्हें भारतीय मेडिकल ग्रेजुएट्स के समान स्टाइपेंड और सुविधाएं मिलनी चाहिए।
अगस्त 2022 से मिलने लगा था स्टाइपेंड
याचिकाकर्ताओं के मुताबिक, चिकित्सा शिक्षा संचालनालय ने 5 अगस्त 2022 को इस संबंध में आदेश जारी किया था। इसके बाद उन्हें स्टाइपेंड मिलना शुरू हो गया, लेकिन इंटर्नशिप शुरू होने से लेकर अगस्त 2022 तक की अवधि का भुगतान नहीं किया गया।
डॉक्टरों ने इसी अवधि के बकाये स्टाइपेंड और पहले जमा कराई गई एक लाख रुपये की फीस वापस दिलाने की मांग को लेकर हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी।
राज्य सरकार ने फीस वापसी का किया विरोध
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने डॉक्टरों की फीस वापसी की मांग का विरोध किया। सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि संबंधित डॉक्टरों ने वर्ष 2015 में ही इंटर्नशिप फीस जमा कर दी थी।
सरकार ने यह भी बताया कि 24 नवंबर 2022 को हुई बैठक में निर्णय लिया गया था कि 4 मार्च 2022 के NMC परिपत्र जारी होने से पहले जिन छात्रों से इंटर्नशिप फीस ली जा चुकी है, उनकी रकम वापस नहीं की जाएगी। राज्य सरकार का कहना था कि बाद में जारी दिशा-निर्देशों के आधार पर पहले जमा कराई गई फीस की वापसी का दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने क्यों खारिज कीं याचिकाएं?
मामले की सुनवाई के बाद अदालत ने पाया कि सभी याचिकाकर्ताओं ने 18 नवंबर 2021 से पहले अपनी विदेशी मेडिकल डिग्रियां प्राप्त की थीं। इसी तारीख से NMC के कंपल्सरी रोटेटिंग मेडिकल इंटर्नशिप रेगुलेशंस, 2021 प्रभावी हुए थे।
फीस वापसी के मुद्दे पर अदालत ने राज्य सरकार के 24 नवंबर 2022 के निर्णय को रिकॉर्ड पर लिया। वहीं, अगस्त 2022 से पहले के स्टाइपेंड के बकाये को लेकर याचिकाकर्ता ऐसा कोई अन्य लागू प्रावधान या विशेष निर्देश पेश नहीं कर सके, जिसके आधार पर उन्हें पिछली अवधि का भुगतान दिलाया जा सके।
इन्हीं तथ्यों और कानूनी आधारों पर जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की एकल पीठ ने तीनों याचिकाएं खारिज कर दीं। इसके साथ ही डॉक्टरों को जमा की गई एक लाख रुपये की फीस वापस नहीं मिलेगी और अगस्त 2022 से पहले के स्टाइपेंड के भुगतान की मांग भी स्वीकार नहीं की गई।
किन डॉक्टरों ने दायर की थी याचिकाएं?
मुख्य याचिका डॉ. श्यामू कुमार जांगड़े और 13 अन्य डॉक्टरों ने दाखिल की थी। इनके अलावा डॉ. छत्रेश चौधरी और डॉ. प्रणव पांडेय ने भी अलग-अलग याचिकाएं दायर की थीं।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता विकास श्रीवास्तव और राज्य सरकार की ओर से पैनल अधिवक्ता आकांक्षा वर्मा ने पक्ष रखा। हाईकोर्ट के इस आदेश से विदेशी मेडिकल ग्रेजुएट डॉक्टरों को फीस वापसी और पुराने स्टाइपेंड के बकाये के मामले में राहत नहीं मिल सकी।
