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    रायपुर की जीवनदायिनी ‘खारुन’ के अस्तित्व पर संकट, नदी में खुलेआम अवैध डंपिंग कर ठेकेदार व जिम्मेदार अधिकारिओं ने पर्यावरण नियमों की उड़ाई धज्जियाँ :प्रदुमन शर्मा।

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    रायपुर की जीवनदायिनी ‘खारुन’ के अस्तित्व पर संकट, नदी में खुलेआम अवैध डंपिंग कर ठेकेदार व जिम्मेदार अधिकारिओं ने पर्यावरण नियमों की उड़ाई धज्जियाँ :प्रदुमन शर्मा।

    News Lead18By News Lead18April 7, 2026
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    रायपुर। राजधानी की जीवनदायिनी खारुन नदी को प्रदूषण से बचाने और पर्यावरणीय नियमों के उल्लंघन को रोकने के लिए अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संरक्षण आयोग ने कड़ा रुख अपनाया है। IHRPC के प्रदेश महासचिव प्रदुमन शर्मा ने छत्तीसगढ़ पर्यावरण संरक्षण मंडल के क्षेत्रीय अधिकारी को पत्र सौंपकर खारुन नदी में निर्माण सामग्री और मलबे की अवैध डंपिंग के विरुद्ध कठोर दंडात्मक कार्रवाई की मांग की है।

    शिकायत के अनुसार, कुम्हारी स्थित पुराने पुल की मरम्मत के दौरान ठेकेदार मिथिलेश मिश्रा द्वारा NH-PWD विभाग के अधिकारियों की कथित अनदेखी और मिलीभगत से निर्माण कार्य का मलबा सीधे चिन्हित डंपिंग साइट ना जाकर नदी के प्रवाह में डंप किया जा रहा है। श्री शर्मा ने इसे एक गंभीर “पर्यावरणीय अपराध” बताते हुए कहा कि यह कृत्य सर्वोच्च न्यायालय और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के स्पष्ट आदेशों का उल्लंघन है।

    उन्होंने ने स्पष्ट किया है कि ‘मैली से निर्मल यमुना’ पुनरुद्धार परियोजना और NGT के कड़े नियमों के तहत नदी जल क्षेत्र में मलबा डालना दंडनीय है। यह पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 की धारा 15 और निर्माण एवं विध्वंस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016 का सीधा उल्लंघन है। साथ ही, यह नागरिकों के संविधान प्रदत्त ‘स्वस्थ जीवन जीने के अधिकार’ (अनुच्छेद 21) पर भी प्रहार है।

    श्री शर्मा ने पर्यावरण संरक्षण मंडल के क्षेत्रीय अधिकारी से मांग करते हुए कहा की संबंधित ठेकेदार पर भारी आर्थिक जुर्माना लगाया जाए और उसका लाइसेंस तत्काल रद्द किया जाए एवं नदी में डाले गए समस्त मलबे को 48 घंटे के भीतर ठेकेदार के खर्च पर निकलवाकर नदी को उसकी मूल स्थिति में वापस लाया जाए। निगरानी में लापरवाही बरतने वाले NH-PWD के संबंधित इंजीनियरों और अधिकारियों के विरुद्ध विभागीय जांच एवं कानूनी कार्रवाई शुरू हो।

    भविष्यगामी विधिक कदम: प्रदेश महासचिव प्रदुमन शर्मा ने प्रशासन को अवगत कराया है कि, “पर्यावरण संरक्षण के प्रति अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी का निर्वहन करते हुए, यदि निर्धारित सात दिनों की अवधि में शासन द्वारा संतोषजनक कार्यवाही सुनिश्चित नहीं की जाती है, तो आयोग इस जनहित के मुद्दे को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल एवं मानवाधिकार आयोग के समक्ष आधिकारिक रूप से प्रस्तुत करने हेतु बाध्य होगा। इसकी संपूर्ण उत्तरदायित्व संबंधित विभाग एवं प्रशासन की होगी।”

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